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उत्तराखंड का अस्थिर पारिस्थितिकी तंत्र एवं असंतुलित होती पर्यावरणीय सभ्यता

उत्तराखंड का अस्थिर पारिस्थितिकी तंत्र एवं असंतुलित होती पर्यावरणीय सभ्यता


पर्यावरण असंतुलन : आज के भौतिकवादी उत्तराखंड की कोई भी भौतिकवादी यात्रा हो। वो उत्तराखंड के पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद कर रही है। पर्यावरण को असंतुलित कर अस्थिर बना रही है। शीतकालीन यात्रा उत्तराखंड के लिए और भी जले में नमक डालने के बराबर है। कारण आजकल शीतकाल में बहुत से पशु पक्षियों का यहां प्रवास कर सहवास का समयकाल होता है।

पौष समाप्त हो गया पर वर्षा नहीं हुई। जितनी वर्षा पहले बरसात में होती थी, उतनी ही वर्षा पहले जाड़ों में भी होती थी और वर्षा बर्फ बनकर पहाड़ियों, वनों को ढक देती थी। इसलिए जंगली जानवर शीत निंद्रा में चले जाते थे। कुछ सहवास में ब्यस्थ रहते थे। आज उत्तराखंड का जंगली जानवर रियासी इलाकों में क्यों है। कारण है, हमारी नीतियां थटी फस्ट यात्रियों से चंद्रशिला पर मनवा रही हैं। उसमें उत्तराखंडी भी सम्मिलित है। फिर जंगली जानवर कहां जायेगा।

बिना ठोस वन नीति, ठोस पर्यटन नीतियों के हम यात्रा का संचालन उत्तराखंड में विगत 25 वर्षों से करते आ रहे हैं। जिसका परिणाम उक्त चोपता तुंगनाथ का ये चलचित्र हमें बयां कर रहा है। जो बहुत से दृष्टिकोण से हमें दृष्टिगोचित करवा रहा है, कि कयी टन कचरा हिमालय के उच्च वन क्षेत्रों, बुग्यालों, ग्लेशियरों तक पहुंच रहा है।

वन अभ्यारण क्षेत्रों में असीमित मानवीय गतिविधियां आज बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र का बहुत बड़ा कारण है। आज टिहरी डेम की आड़ में उत्तराखंड में सैकड़ों डेम बन चुके हैं। नदियों का अविरल प्रवाह उसके मूल स्रोत मूल स्थान पर ही रोक दिया गया है। उदाहरण, कुंड, विष्णु प्रयाग।

उत्तराखंड के वनों के प्रति हमारी कृतज्ञ सवैंदनाओं को आज इस बात से भी मूल्यांकन कर सकते हैं। कि उत्तराखंड के वन क्षेत्रों से गुजरने वाली सड़क पर आज भी वन रोड साईनेज नहीं हैं। रिजर्व फारेस्टों और सिविल फारेस्टों के चिन्हित सीमाकंन बोल्ड नहीं हैं। वन्य अभ्यारण क्षेत्रों में प्रवेश के बोल्ड नियमों एक्टों के साथ नहीं हैं। वन्य अभ्यारण क्षेत्र चिन्हित नहीं हैं। जबकि दियासलाई,धार धार हथियार और ज्वलनशील पदार्थ फारेस्टों के अंदर ले जाना फारेस्ट एक्ट के तहत प्रतिबंधित और कानूनी धाराओं के साथ अपराध है।

राज्य गठन के बाद आज तक कोई भी यात्रा फारेस्ट एक्टों के साथ संचालित नहीं की गयी हैं। ये सत्य पहाड़ का वर्तमान पर्यावरणीय परिवेश प्रमाणित कर रहा है। इसीलिए हजारों टन कचरा ग्लेशियरों तक पहुंच रहा है। जबकि इन मामलों में यात्रियों तक का चालान होना चाहिए था। उत्तराखंड में यात्रा के दौरान उत्तराखंड से बाहर के प्राईवेट व्हीकलों पर प्रतिबंध होना चाहिए। सिर्फ कमर्शियल वाहनों को अनुमति होनी चाहिए। क्योंकि असीमित यात्रियों के साथ असीमित वाहनों से जो आज उत्तराखंड का पारिस्थितिकी तंत्र और उसका पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, उसके जिम्मेदार हमारी नीतियां हैं। क्योंकि उत्तराखंड राज्य को आज तक वन संपदा की आर्थिकी के सहारे से ही संचालित करने का प्रयास किया गया है। जिसमें पर्यटन भी वनों से ही संचालित होता है। इसलिए अभी भी हमारे पास जागने और सोचने का समय है। हमें उत्तराखंड राज्य की आर्थिकी के नये स्रोत तलाशने की आवश्यकता है। वनों के सहारे उत्तराखंड का संचालन भविष्य की पीढ़ियों के लिए बहुत कुछ खौ चुका होगा। न हमारे पास वन बचेंगे न पर्यावरण।

उत्तराखंड राज्य गठन (9 नवंबर 2000) के बाद, राज्य ने अपनी पहली विशिष्ट वन नीति 2001 में अपनाई थी, जो राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अनुरूप थी और जैव विविधता, स्थानीय ज्ञान और पारिस्थितिक संतुलन पर केंद्रित थी, और इसके बाद 2006 में एक पौध रोपण नीति (Afforestation Policy) जैसी महत्वपूर्ण नीतियां भी आईं, जो अलग-अलग पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करती हैं, लेकिन एक व्यापक नई राज्य वन नीति अभी तक घोषित नहीं हुई है, बल्कि 2001 की नीति ही आधार बनी हुई है, जिसे समय-समय पर संशोधनों और नई नीतियों (जैसे पौध रोपण नीति) के साथ लागू किया जा रहा है।  उत्तराखंड में फारेस्ट के साथ बहुत बड़ी लापरवाही बरती जा रही है। क्योंकि राज्य गठन के बाद उत्तराखंड के वनों को सिर्फ शोषण और आमदनी का ही जरीया बनाया गया, इसलिए वनों में वन्निकरण ध्वस्त हैं। जिस कारण जानवर हो या आग आसानी से गांवों तक पहुंच रही है। ग्रीष्मकाल में पहाड़ी मानवीय परिवेश आग को झैले। शीतकाल में जंगली जानवरों को झैले और देहरादून से नीति देहरादून के लिए बने। जबकि उत्तराखंड के 11 पर्वतीय जनपदों के सभी 16,793 गांव यहां की 12089 सिविल फारेस्टों ,6 राष्ट्रीय उद्यान (National Parks), 7 वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries), 4 संरक्षण रिजर्व (Conservation Reserves), फारेसटों के बीच में बसे हुए हैं और वनों का संचालन आज भी कमीश्नरी शासनकाल में दुसरे कमीश्नर जी डब्ल्यू ट्रेल के बनाये नियमों पर संचालित हो रहा है, जो 1816 से 1830 की बनाई अंग्रेजी वन नीतियां हैं। इसलिए आज भी उत्तराखंड की 12089 सिविल फारेस्टें लावारिस पड़ी हैं। जो अधिनियमों के बजाय नियमावलियों पर उनके संसोधन पर संचालित होती हैं।

राज्य गठन के बाद 2005,2012,2024 तीन बार सिविल फारेस्ट की नियमावली में संशोधन किया गया किंतु उसको आज भी संवैधानिक दर्जा देने की सोच को क्रियान्वित नहीं किया गया। इसलिए जो वास्तविक पहाड़ी है। वो अपने वनों के लिए भी लड़ना सीखें। वन राजनीति का नहीं अपितु भविष्य के मानवीय जीवन का हिस्सा हैं। क्योंकि वन सभी के हैं और आज वर्तमान के साथ भविष्य की भी आवश्यकता वन हैं। किंतु वनों का सुख दुःख पुछने वाला कोई नहीं है। क्योंकि वास्तविक रूप में देखा जाय तो भू नीति की बात होती है। मूल निवास की बात होती हैं, स्थायी राजधानी की बात होती है किंतु वन नीति की बात नहीं होती है। बहुत कम लोग उत्तराखंड के वनों को उसके उस इतिहास को जानते हैं। जिसको दुनिया में विश्व युद्ध झैल रहे कालखंड में भी हमारे पूर्वजों ने सरंक्षणता देने का प्रयास किया।

उत्तराखंड के कुल क्षेत्रफल का 72 प्रतिशत भू आवरण वनों के पास निहित है। किंतु उस वन आवरण के पास आज तक कोई ठोस नीति नहीं है। उसे आज तक अधिनियम एक्ट से नहीं जोड़ा गया है। आप यहां पर समझ सकते हैं कि उत्तराखंड वन नीतियों के मामले में कितने गहरे पानी में हिचकोले खा रहा है और वनों के प्रति कितना कृतज्ञ और संवेदनशील है। हम पहाड़ियों का भविष्य कितने गहरे पानी में होगा। अति भौतिकवादी दृष्टिकोण उसकी सरंचना उत्तराखंड के लिए अभिशाप पहले भी थी। और आज भी है। और भविष्य में भी रहेगी क्योंकि उत्तराखंड वन्य अभ्यारणों के साथ अति संवेदनशील ग्लेशियरों से आच्छादित प्रदेश है। उत्तराखंड भूकंप का भी केंद्र बिंदु है। केदारनाथ जैसा सैंचुरी जोन चारों ओर से हिम ग्लेशियरों से घिरा है और हमको वहां अनलिमिटेड हेली सेवाओं और महेंद्रा थार के साथ यात्रा चलानी है, जबकि केदारनाथ के ऊपर कयी अदृश्य हिम ताल हैं। उत्तराखंड की लोक संस्कृति भी उसके वनों से जुड़ी हैं। फिर भी पारिस्थितिकी तंत्र और उसके  पर्यावरणीय संतुलन पर हम आज भी न गंभीर हैं न चिंतनीय और न विचारणीय। जो उत्तराखंड के भविष्य पर मंडराती एक और नयी आपदा है। धन्यवाद।

देवेन्द्र भट्ट

प्रधान मयकोटी

प्रदेश पुरस्कृत वन पंचायत सरपंच

वर्सिल पवेक

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