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बहुभाषी काव्य कौथिक में डॉ कुसुम भट्ट को मिला साहित्य सम्मान

 बहुभाषी काव्य कौथिक में डॉ कुसुम भट्ट को मिला साहित्य सम्मान



नई दिल्ली : मासिक साहित्यिक संगोष्ठी (दिल्ली) के प्रथम वार्षिकोत्सव के शुभ अवसर नववर्ष, मकरैणी-उत्तरैणी एवं गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में रविवार 18 जनवरी 2026 को पहला बहुभाषा काव्य कौथिग सम्पन्न हुआ। 

वासुदेव कुटुंब की तर्ज पर साहित्य के समग्र विकास एवं संवर्धन हेतु हिंदी, नेपाली, गढ़वाली कुमाउनी एवं जौनसारी पांच भाषाओं के लगभग 100 से ऊपर कवियों/साहित्यकारों की काव्य गोष्ठी अपने आप में एक ऐतिहासिक पहल रही। 

सम्मान एवं पुस्तक विमोचन

काव्य कौथिग में डॉ हेमा जोशी 'हिमाद्रि' की दो पुस्तकों- विज्ञान कथा: एक परिचय (Science fiction: an introduction) 2) कंडाली धूप‌ के विमोचन के साथ डॉ कुसुम भट्ट को साहित्य सम्मान दिया गया। गणेश खुगसाल गणी, निदेशक लोक कला निष्पादन केंद्र श्रीनगर के हाथों उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया ।

सम्मान समारोह, पुस्तक विमोचन और मासिक सामुहिक जन्मोत्सव की खुशी में पंचमेवा नारियल रोट भेलि का अठ्वाड़ उत्सव भी मनाया गया। साथ में पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई। पिछले महीने की साहित्यिक संगोष्ठी में गढ़वाली के मुंशी प्रेमचंद से संबोधित कमल रावत को साहित्य सम्मान दिया गया‌‌ था।

गणेश खुगशाल 'गणी' डॉ कुसुम भट्ट के सम्मान समारोह के दौरान भावुक हुये। उन्होंने कहा कि यह कुसुम बिटिया के सम्मान से बड़ा उनका सम्मान है। कवियों को बड़े पटल पर अपनी कविता का लोहा मनवाने से पहले इसी तरह की मासिक साहित्यिक संगोष्ठी की भट्टी में लोहे की तरह तपना होगा। साहित्य विधाओं की चर्चा करते हुए उन्होंने पजल साहित्य की अप्रतिम सफलता एवं स्वीकार्यता पर भी अपनी ठोस बात रखी। 

इस अवसर पर कुसुम जी ने कहा जीवन के कुछ क्षण बहुत ही अनमोल होते हैं शायद शब्दों में व्यक्त न किए जा सके। ऐसे ही मेरे साथ गढ़वाल भवन दिल्ली में रहा जब मुझे उत्तराखंड की संस्कृति के सशक्त हस्ताक्षर निदेशक लोक कला निष्पादन केंद्र श्रीनगर आदरणीय  गणेश कुखशाल (गणी) जी के हाथों साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया।

उनसे परिचय मेरा बहुत पुराना है परंतु मुझे उम्मीद नहीं थी की वह मेरे सम्मान के लिए यहां पर आएंगे उनको यहां देखना मुझे आश्चर्य चकित कर गया और उनके द्वारा जो भाव अभिव्यक्ति थी उसने तो मुझे निशब्द और भावुक कर दिया। उनकी बातों में वही प्रेम और अपनापन था जो लड़की अपने मायके वालों की तरफ से महसूस करती है। इस क्षण  वह  भी काफी भावुक थे। 

आमंत्रित सभी कवियों एवं साहित्य प्रेमियों का पारंपरिक 'पाणि पिठै' से स्वागत द्वार पर स्वागत गया। विगत वर्ष रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर स्थापित हुई श्रीलगुळि (मनी प्लांट) के मंगल गान पूजन के साथ काव्य कौथिग का शुभारंभ हुआ। 

अपने पारंपरिक परिधान में आये अपने पड़ोसी मित्र देश नेपाल के कवियों ने अपने रोटी-बेटी के रिश्ते को मजबूती प्रदान की। सुदूर गौचर चमोली जिले से पारंपरिक परिधान में आई पजल परिवार की दीसा धियाणियों राजेश्वरी पंवार (रामजी) पुष्पा कनवासी (हनुमान जी) और सुशीला बिष्ट के सुंदर मागल गान ने कवियों के लिए 'रेड कार्पेट स्वागत' का काम किया। इसी तरह पारंपरिक परिधानों एवं आभूषणों से सुशोभित कमला रावत, डॉ रामेश्वरी नादान, डॉ कुसुम भट्ट, रंजना नौटियाल, पूनम तोमर, ‌प्रमिला तोमर और अनुराधा सोलंकी ने काव्यपाठ का आगाज हरी झंडी दिखाकर किया।

पजल हजारिका पजल सम्राट जगमोहन सिंह रावत 'जगमोरा' कहते हैं कि साहित्य को भाषायी बंधन में नहीं बांधा जा सकता। हर व्यक्ति के अंदर मणि-कांचन की तरह साहित्य छिपा हुआ होता है। जरूरत है मणिमहेश की तरह उस साहित्यिक मणि को उजागर करने की। 

ओवरिष्ठ साहित्यकार सुशील बुड़ाकोटी 'शैलांचली' ने हजार ग्राम हजार धाम, हमरी भाषा हमरी पछ्याण के संदेश के साथ की गई पजल यात्राओंं एवं मासिक साहित्यिक संगोष्ठी के विगत एकवर्ष के सम्पूर्ण कार्यकिलापों पर अपनी सारगर्भित बात रखी। डॉ वीरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि इस तरह के भाषा, संस्कृति, साहित्य के त्रिवेणी समागम हमें अपने मूल से जोड़ने में सहायक सिद्ध होंगे। मास्टर रुद्र घनशाला ने गढ़वाली भाषा में मासिक साहित्यिक संगोष्ठी पर अपनी सारगर्भित बात रखी।

नेपाली कवियों ने किया भावविभोर

आमंत्रित कवियों में नेपाली भाषा के कवियों गंगाप्रसाद रिजाल, टेकराज पनेरू, प्रजापति नेगी, रमेश पन्त 'मीतबन्धु', हेमबाबु लेखक ने अपनी कविताओं से भारत नेपाल मैत्री संबंधों को और मजबूती प्रदान की है। प्रजापति नेगी की नेगचारी देखने लायक थी, जब उनके काव्य गीत की थाप पर जगमोरा मोर की तरह नाचने लगा। जंगल में बल मोर नाचा, किसने देखना? पजल में जगमोरा नाचा सबने देखा।

हिंदी भाषा के कवियों अशोक अवस्थी अंजाना, जगदीश मीणा,‌ नीलेश निराला, पंकज प्रकाश, महक नैन, डॉ मनोज कामदेव, डॉ राम निवास तिवारी 'इंडिया', राजेन्द्र सिंह रावत, सुबोध भारद्वाज और विवेक चौहान बाजपुरी ने उत्तराखंड की भाषाओं के साथ मिलकर बहुरंगी चोली-दामन का साथ दिया।

कुमाउनी भाषा के कवियों ओम प्रकाश आर्य, नीरज बवाड़ी, डॉ हेमा जोशी 'हिमाद्रि' और जौनसारी भाषा के कवियों खजान चंद शर्मा, प्रमिला तोमर, पूनम तोमर, राम सिंह तोमर और सुल्तान सिंह तोमर ने मिलकर इसे उत्तरैणी मकरैणी कौथिग के रंगों में रंगने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। गढ़वाली भाषा के कवियों ने सभी भाषाओं के कवियों के साथ समागम में गणतंत्र का तिरंगा झंडा फहरा दिया। 

गढ़वाली भाषा के कवियों अंजना बिष्ट, आशा खंडूड़ी, ओम ध्यानी, ओम प्रकाश पोखरियाल, उदय ममगाईं राठी, डॉ उनीता सच्चिदानंद (धस्माना), डॉ कुसुम भट्ट, कैलाश कुकरेती, गोविंद राम पोखरियाल 'साथी', चंदन प्रेमी, जबर सिंह कैंतुरा, जयपाल सिंह रावत, जय सिंह रावत जसकोटी, दर्शन सिंह रावत, दिग्विजय सिंह बिष्ट, दिनेश ध्यानी, दीवान सिंह नेगी, देव रावत, देवेन्द्र सिंह रावत, द्वारिका प्रसाद चमोली, निर्मला नेगी, नीरज बवाड़ी, पयाश पोखड़ा, पार्थसारथि थपलियाल, पुष्पा कनवासी, डॉ पृथ्वी सिंह केदारखंडी, भगवती प्रसाद जुयाल गढ़देशी, रघुवर दत्त शर्मा 'राघव', रंजना नौटियाल, राजेश्वरी पंवार राम जी, डॉ रामेश्वरी नादान, रविन्द्र गुडियाल, रोशन लाल 'हिंद कवि', संदीप गढ़वाली (घनशाला), सते सिंह रावत, सतीश रावत, सागर पहाड़ी, सीमा नेगी भैंसोड़ा 'श्रीमा', सुनील थपलियाल 'घंजीर', सुभाष गुसाईं, सुरेशी दानू, सुशीला बिष्ट, डॉ सुशील सेमवाल, शशि बडोला, विमल सजवाण, विश्वेश्वर प्रसाद सिल्सवाल, सिमरन रावत, वीरेंद्र जुयाल 'उपिरि', डॉ हरेंद्र सिंह असवाल इत्यादि की काव्य प्रस्तुति शानदार रही। सोम प्रकाश ने अपनी डोगरी कविता से अभिभूत किया।

चार चरणों में हुये काव्य कौथिग में मंच संचालन नीरज बवाड़ी, वीरेंद्र जुयाल 'उपिरि', सुभाष गुसाईं और विवेक चौहान बादल बाजपुरी ने किया। 

बल अंत भला सब भला, जो अकेला चला, संग कांरवा चला। अंत में जगमोरा के पजल गीतों की थाप पर थड़िया चौंफला नृत्यगान के साथ काव्य कौथिग का थौ बिसाना हुआ। बल चल मेरा थौला जख जौला वखी खौला। 

मनवर सिंह रावत, युगराज सिंह रावत, इंद्रजीत सिंह रावत, शिवचरण सिंह रावत, नरेंद्र सिंह रावत, वीरेंद्र सिंह, सुरेन्द्र सिंह, कैलाश नैथानी, नागेंद्र सिंह रावत, कल्याण सिंह चौहान, भूपेंद्र सिंह बिष्ट, धीरेन्द्र थपलियाल, उदय ममगाईं राठी का हाथ मासिक साहित्यिक संगोष्ठी के सहयोग हेतु दैणो (दाहिना) हुआ।

इस मौके पर सुशीला रावत, खुशहाल सिंह बिष्ट, रमेश चंद्र घिल्डियाल 'सरस', अजय सिंह बिष्ट, संजय शर्मा दरमोड़ा, पदम सिंह, जगदीश सहगल, मदन सिंह रावत, बृजमोहन सिंह नेगी, कमला रावत नीलम रावत, संगीता गुसाईं, सविता पंत, गजपाल सिंह रावत, विश्वबंधु उनियाल, जोगाराम आर्य अनमोल, अंजली घनशाला, कविता शर्मा, राजेन्द्र सिंह, एन एस रावत, महेंद्र सिंह रावत, कृपाल सिंह बनकोटी, धीरेंद्र सिंह बर्त्वाल, धीरेन्द्र थपलियाल, देवदत्त धस्माना, यश डोभाल, मनोज कुमार, अमर सिंह, सत्य प्रकाश नैथानी, सुदर्शन जुगरान, अनीता जुगरान, खुशी, विकास चमोली, संदीप गुसाईं, रामचरण धस्माना, सार्थक धस्माना, राकेश सिंह गुसाईं, रेनू उनियाल, पवन गुसाईं, विशन दत्त नैनवाल, विमला देवी, उम्मेद सिंह रावत, हुकम सिंह कंडारी, दीप्ति रावत, पंकजा पाठक, मायाराम बहुगुणा, पियूष, जयलाल नवानी, जितेन्द्र सिंह रावत, राकेश रावत, दिनेश गुसाईं, मुरलीधर ढौंडियाल, पंकज शर्मा, हरेंद्र पुरी, राज कुमार रावत, बिनोद जोशी, आनंद सिंह रावत, जसबीर सिंह, अनिल कुमार पंत, राकेश कुमार, सुरेन्द्र कुमार जुयाल, एम सी चतुर्वेदी, प्रवीण सिंह रावत, विक्रम सिंह रावत, सर्वेश्वर बिष्ट, नीलम रावत, प्रदीप तिवारी, रणजीत सिंह रावत, अर्जुन रावत इत्यादि लगभग 170 गणमान्य लोगों की गरिमामय उपस्थिति रही।

जगमोहन सिंह रावत 'जगमोरा'

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