देहरादून : उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून में पूर्व सशस्त्र सैनिक एवं अर्धसैनिक बल समुदाय, उत्तराखंड द्वारा बुधवार 7 जनवरी को अंकिता केस में CBI की मांग को लेकर एक अत्यंत अनुशासित, गरिमामय, भावनात्मक और मौन मार्च निकाला गया। इसमें बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, वीर नारियाँ एवं मातृशक्ति ने सहभागिता की।
केन्द्रीय गौरव सैनानी एसोसिएशन, उत्तराखंड के नेतृत्व में संचालित मार्च सुबह 11:30 बजे आरम्भ हुआ और नेवल हाइड्रोग्राफिक कार्यालय से होते हुए 2:30 बजे परेड ग्राउंड में सम्पन्न हुआ। जिसमें विभिन्न पूर्व सैनिक संगठनों ने भी सहभागिता की।
काले वस्त्रों में, श्वेत मौन के साथ उठाए गए बैनरों के हर अक्षर में बेटी अंकिता की पीड़ा, दर्द और न्याय की पुकार स्पष्ट झलक रही थी। यह मौन किसी कमज़ोरी का नहीं, बल्कि उस नैतिक साहस का प्रतीक था, जो सैनिक परंपरा की पहचान है।
यह मौन मार्च किसी राजनीतिक दल का प्रदर्शन नहीं, न ही यह आक्रोश, नारेबाज़ी या शक्ति-प्रदर्शन का मंच था। यह मार्च पूर्ण न्याय तथा CBI जाँच की संवैधानिक माँग को लेकर, उत्तराखंड के पूर्व सशस्त्र सैनिक एवं अर्धसैनिक बल समुदाय की सामूहिक अन्तरात्मा की शांत, अनुशासित और गरिमामय अभिव्यक्ति है।
उत्तराखंड एक सैन्य-बहुल्य प्रदेश है, जहाँ वीरता के साथ-साथ मर्यादा, अनुशासन और कर्तव्यबोध जीवन-मूल्य हैं। सैनिक न भीड़ का हिस्सा बनता है, न उत्तेजना में बोलता है। वह तब बोलता है, जब न्याय का मौन टूटने लगता है और आज वही क्षण देखने को मिला।
सैनिक संगठनों ने कहा यह मार्च किसी सरकार के विरुद्ध या किसी व्यक्ति, दल या सत्ता को धमकाने के लिए नहीं, बल्कि न्याय के पक्ष के साथ संविधान की आत्मा को स्मरण कराने के लिए था। हमारे लिए मौन सबसे कठोर और प्रभावशाली वक्तव्य है, जिसमें शोर नहीं, संकल्प होता है, नारे नहीं, नैतिक बल होता है।
सरकार से हमारी अपेक्षा टकराव की नहीं, बल्कि संवैधानिक संवेदनशीलता की है। CBI जाँच की माँग अविश्वास का नहीं, बल्कि पूर्ण सत्य तक पहुँचने के संकल्प का प्रतीक है। यदि सत्य निर्भीक है, तो जाँच से भय क्यों?
आज का यह मौन मार्च इतिहास में एक उदाहरण बनेगा कि जब राजनीति शोर करती है, तब सैनिक मौन की गरिमा से राष्ट्र को आईना दिखाता है।
यह मौन है—पर कमजोर नहीं।
यह शांत है—पर अडिग है।
और यही उत्तराखंड की सैनिक परंपरा है।

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