कर्णप्रयाग : देश के प्रधानमंत्री जहां विकसित भारत की बात करते हैं वहीं उत्तराखंड के अनेकों गांव आज भी सड़क विहीन हैं। प्रदेश सरकार से गुहार लगाने के बावजूद इन गांवों के ग्रामीणों को कई किलोमीटर पैदल चलकर सड़क मार्ग तक आना होता है। कर्णप्रयाग तहसील के अंतर्गत ऐसा ही एक गांव सकण्ड है जहां अभी तक सड़क नहीं पहुंच पाई है। ग्रामीण कई सालों से लगातार सड़क की मांग करते आ रहे है। लेकिन उनकी मांग पर आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। ऐसे में आक्रोशित ग्रामीणों ने मजबूरन जूलूस निकालर प्रदर्शन किया और कर्णप्रयाग तहसील परिसर में धरना दिया । ग्रामीणों ने तहसील परिसर में करीब चार घंटे तक धरना दिया। ग्रामीणों का कहना कि जब तक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती उनका धरना जारी रहेगा।
ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अपर बाजार से तहसील परिसर तक जूलूस निकाला जिसके बाद वे तहसील परिसर में धरने पर बैठ गए। ग्रामीणों ने बताया कि सड़क सुविधा न होने से हमें आज भी मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए 9 किमी की पैदल दूरी नापनी पड़ती है। दिक्कतें तब अधिक बढ़ जाती है जब गांव में कोई बीमार हो जाता है या किसी गर्भवती को अस्पताल पहुंचाना होता है। ऐसे में सड़क न होने से बीमार लोगों को डंडी के माध्यम से सड़क तक पहुंचाना पड़ता है।
सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र सिंह ने कहा कि गांव में उत्तम किस्म की दालें और आलू होते है। लेकिन सड़क न होने से ये चीजें बाजारों तक नहीं पहुंच पाती है। और गांव में ही सड़ जाती है। यदि गांव तक सड़क होती तो निश्चित ही यहां के काश्तकारों की आर्थिकी में सुधार होता।
ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी, नर्मदा देवी, उषा देवी, अंकिता देवी, पुष्पा देवी, अमित सिंह आदि का कहना है कि पहले गांव में करीब 45 परिवार थे। लेकिन धीरे-धीरे गांव से पलायन होने लगा और अब गांव में 22 के करीब परिवार बसे है, जिनमें अधिकतर बुजुर्ग लोग शामिल है। कई बार सर्वे होने के बाद भी आज तक सड़क कटिंग का काम शुरू नहीं हो पाया है। हम लोग नेताओं और अधिकारियों के आश्वासन सुनते सुनते पक चुके है। हमारी हजारों कोशिशों के बाद भी सड़क की समस्या हल नहीं हो पा रही है। ऐसे में अब हमें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। क्योंकि हमें लगता हैं कि सरकारें केवल आंदोलनों की भाषा समझती है।
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