पंच परिवर्तन से राष्ट्र निर्माण को नई दिशा
नई दिल्ली : आकाशवाणी भवन, नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में “पंच परिवर्तन” को भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक पुनर्निर्माण का प्रभावी माध्यम बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि नागरिक आचरण, सामाजिक समरसता और कर्तव्यबोध से होता है।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन एवं महापुरुषों को पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इस अवसर पर वक्ताओं ने भारतीय चिंतन परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की भावना ही भारत को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती रही है।
सामाजिक समरसता को बताया पंच परिवर्तन की आत्मा
संगोष्ठी में सामाजिक समरसता को पंच परिवर्तन का केंद्रीय तत्व बताते हुए कहा गया कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इस संदर्भ में पं. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और अंत्योदय दर्शन को सामाजिक न्याय का व्यवहारिक मार्ग बताया गया।
वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा व्यवस्था सामाजिक समरसता का एक व्यवहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहाँ जाति, क्षेत्र, भाषा या वर्ग के आधार पर कोई भेद नहीं होता और सभी समान अनुशासन में सहभागी होते हैं। इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 की भावना का सामाजिक जीवन में अनुप्रयोग बताया गया।
इस अवसर पर यह भी कहा गया कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का भाव ही भारतीय समाज की मूल चेतना रहा है।
कुटुंब प्रबोधन को सामाजिक स्थिरता की नींव बताया
वक्ताओं ने कुटुंब को समाज की प्रथम पाठशाला बताते हुए कहा कि मूल्यविहीन विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। पीढ़ियों के बीच संवाद, नैतिक शिक्षा और उत्तरदायित्व बोध को कुटुंब प्रबोधन का आधार बताया गया।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” जैसे विचार आज भी सामाजिक संतुलन और संस्कार निर्माण के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं। संविधान के अनुच्छेद 39(f) का उल्लेख करते हुए बच्चों के नैतिक विकास पर बल दिया गया।
पर्यावरण संरक्षण को नागरिक दायित्व बताया
पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता के रूप में देखा गया है। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” की भावना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पर्यावरण की रक्षा केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(g) को पर्यावरण संरक्षण की संवैधानिक आधारशिला बताया गया।
स्वदेशी को आत्मनिर्भर भारत का सांस्कृतिक आधार बताया
स्वदेशी को केवल आर्थिक अवधारणा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान का विषय बताते हुए वक्ताओं ने कहा कि स्थानीय श्रम, स्थानीय संसाधन और स्थानीय ज्ञान पर आधारित विकास ही भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है।
इस संदर्भ में यह भी कहा गया कि परिश्रम और स्वावलंबन से ही समृद्धि आती है—“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः”—और यही आत्मनिर्भर भारत का मूल मंत्र है।
नागरिक कर्तव्य बोध : संपत्ति की रक्षा भी राष्ट्रीय जिम्मेदारी
संगोष्ठी में नागरिक कर्तव्य बोध पर विशेष बल देते हुए वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों के पालन से मजबूत होता है।
इस दौरान यह चिंता भी व्यक्त की गई कि कई बार आंदोलन या असंतोष के नाम पर राष्ट्रीय संपत्ति, सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक परिवहन और निजी प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुँचाया जाता है, जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि सरकारी और निजी संपत्ति की रक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है और इस प्रकार की तोड़फोड़ संविधान के अनुच्छेद 51A में निहित मूल कर्तव्यों के विरुद्ध है। इस संदर्भ में यह विचार भी रखा गया कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”—कर्तव्य और मर्यादा की रक्षा करने वाला समाज स्वयं सुरक्षित रहता है।
रिपोर्ट : देवेन एस खत्री

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