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दिल्ली में होगा जीत सिंह नेगी जयंती समारोह का आयोजन

 
दिल्ली में होगा जीत सिंह नेगी जयंती समारोह का आयोजन

नई दिल्ली: आगामी 1 फरबरी, 2026 को उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली द्वारा उत्तराखण्ड के लोक संस्कृति के पितामह स्वर्गीय जीती सिंह नेगी की 99 वीं जयंती समारोह का आयोजन डीपीएमआई सभागार न्यू अशोक नगर में किया जायेगा।  साथ ही अगले साल 2027 में स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की 100 वीं जयंती समारोह के लिए जीत सिंह नेगी शताब्दी समारोह समिति का गठन किया जायेगा। 

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि बहुआयामी  प्रतिभा के धनी जीत सिंह नेगी का , जन्म- 2 फ़रवरी, 1925 में पौड़ी गढ़वाल के अयाळ गावं  हुवा था व उनका निधन 21 जून, 2020 को देहरादून में हुआ।  स्वर्गीय जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में जारी हुआ। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे। पर्वतीय संस्कृति एवं भाषा के घोर उपासक, गढ़वाली लोकगीतों के प्रख्यात रचनाकार तथा सुप्रसिद्ध लोकगायक श्री जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड का वह सितारा है जो सदा ही सांस्कृतिक क्षेत्र के क्षितिज में चमक बिखेरता है। वस्तुत: गढ़वाली सहगल जैसी उपमा से अंलकृत श्री नेगी जिस तरह से पर्वतीय संस्कृति, भाषा, लोकगीतों, लोकगाथाओं, लोक नृत्य, लोक संगीत आदि स्वस्थ्य परम्पराओं के उत्थान के लिये समर्पित हैं वह उनकी आभा को और ज्यादा विस्तृत करता है। पर्वतीय जनजीवन को बड़े ही मार्मिक, सजीव एवं प्रभावी ढंग से अपने सजित गीतों, नृत्य नाटिकाओं व गीत-नाटकों के माध्यम से जीवंत कर दिया।

स्वर्गीय जीत सिंह नेगी बचपन से ही गढ़वाली गीत, संगीत व प्रकृति के निकट आत्मिक रूप से जुड़े हुए थे।  यही कारण रहा की बालपन से ही उनका बचपन से ही प्रकृति के सन्निकट रहते हुए उनका गीत-संगीत का उनका यह सुनहरा सफर छात्र जीवन से शुरू हुआ, जब सन् 1942 में पौड़ी से स्वरचित गढ़वाली गीतों का सफल गायन आपने किया। वे अपनी आकर्षक सुरीली धुनों में लोकगीत गाकर लोकप्रिय होने लगे। सन् 1949 में उनके लिए सब कुछ बदल गया जब सर्वप्रथम किसी गढ़वाली लोकगायक के रूप में उन्हें यंग इंडिया ग्रामोफोन कम्पनी ने मुम्बई आमंत्रित किया। जहाँ नेगी के छ: गीतों की रिकार्डिंग हुई। ये गीत काफी प्रचलित हुए। और कला जगत में सराहे भी गये। सन् 1952 को गढ़वाल भातृ मण्डल मुम्बई के तत्वावधान में जीत सिंह नेगी ने नाटक ‘भारी भूल ‘ का सफल मंचन किया। इसके बाद नेगी जी ने वर्ष 1954-55 में हिमालय कला संगम, दिल्ली के मंच से उक्त नाटक का निर्देशन व मंचन किया। गढ़वाल के इतिहास पुरुष टिहरी नरेश के सेनापति माधो सिंह भण्डारी द्वारा मलेथा गाँव की कूल के निर्माण की रोमांचक घटना पर आधारित नाटक ‘मलेथा की कूल’ की रचना की। जिसका मचन 1970 में देहरादून में किया गया। इसके अलावा गढ़वाली लोक-कथाओं के प्रसिद्ध नायक बांसुरी वादक जीतू बगड़वाल के जीवन पर गीत नृत्य नाटक ‘जीतू बगड़वाल’ का क्रमश: 1984, 1987 में देहरादून और चण्डीगढ़ में मंचन हुआ। स्वरचित गढ़वाली गीतों को अपन मधुर एवं प्रेरक वाणी में गाकर संगीत जगत को पहाड़ी संस्कति की ओर आकर्षित करने का सर्वप्रथम बीड़ा उठाने वाले जीत सिंह नेगी के गीत- ‘तू होली ऊँची डाँड्यू मां वीरा घसियारी का भेष माँ’ का उल्लेख भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने सन् 1961 में सर्वप्रिय लोकगीत के रूप में किया है।

रामी’, ‘राजू पोस्टमैन’ जैसे दिल को छूने वाले आपके गीत नाटिका एवं एकांकी ने काफी ख्याति बटोरी। जीत सिंह नेगी के कई गीत नाटिका आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली, लखनऊ से प्रसारित होते रहे हैं तथा ‘रामी’ का हिन्दी रूपांतरण दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारण का सौभाग्य प्राप्त कर चुका है। जीत सिंह नेगी की कई रचनाओं के चलचित्र बन चुके हैं। 1957 में एच.एम.बी. एवं 1964 में कोलम्बिया ग्रामोफोन कम्पनी के लिए स्वरचित आठ गढ़वाली गीतों को अपनी मधुर आवाज देकर एक कीर्तिमान बनाया। चर्चित गढ़वाली फिल्म ‘मेरी प्यारी बोई’ के गीत-संवाद द्वारा आप अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे।

प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को लीजेंडरी सिंगर’ सम्मान से नवाजा गया था उनके साथ ही ‘यंग उत्तराखंड लाइफ टाइम अचीवमेंट’ सम्मान से लोकगायक चंद्र सिंह राही को नवाजा गया। यही नहीं जीत सिंह नेगी के गीतों को संस्कृति विभाग ने पुस्तक के रूप में संकलित किया है। यह उनके लिए किसी खास सम्मान से कम नहीं है। म्यारा गीत नाम की इस पुस्तक में नेगी के 1950 व 60 के दशक में गाए गीत शामिल किए गए हैं। अपने समय में ये गीत गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे। लिहाजा इन गीतों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर भी माना जाता है।1955 से तो नेगी जी की सांस्कृतिक टोली द्वारा देश के विभिन्न नगरों में गीत–नृत्य नाटिकाओं का मंचन किया जाता रहा। इससे पहले 1954 में उन्होंने पहली बार आकाशवाणी दिल्ली के लिए अपने गीतों की रिकार्डिंग की। जिसमें उन्होंने अपना सबसे प्रसिद्ध गीत ” तू होली उच्चि डांड्यों मां वीरा, घसियार्यों का भेष मां, खुद मां तेरी रोणू छौं मैं यख परदेश मां ” गाया। इस गीत की लोकप्रियता का जिक्र भारतीय जनगणना विभाग ने सर्वेक्षण ग्रन्थ में उस समय के सामयिक व सर्वप्रिय गीतों की श्रेणी में रखा।यह उस समय बड़ी उपलब्धि थी

नेगी जी को गीतों को सुनने के लिए उस समय लोग रेडियो को घेर कर घंटों खड़े रहते थे. इस गीत को बाद में नरेन्द्र सिंह नेगी ने भी गाया. नरेन्द्र सिंह नेगी इसके अलावा भी जीत सिंह नेगी जी के अनेक गीतों को गाया गया. जिन्हें टी सीरिज ने एलबम के तौर पर निकाला था. उन गीतों में घास काटीक प्यारी छैला हे, माठू- माठू बास रे मैरा, पिंगला प्रभात का घाम, बसग्याळी उरडी सि, रौंतेली ह्वे गैनी, लाल बुरॉस को फूल खिल्यूँ, चल रे मन माथा जयोंला आदि शामिल थे।

उन्हें जितना लगाव गीत / संगीत से था, उतना ही लगाव अभिनय से भी था. इसी कारण उन्होंने कई नाटक भी लिखे और उनका निर्देशन व मंचन भी किया. जिनमें माधो सिंह भण्डारी के जीवन पर आधारित ” मलेथा की गूल “, भारी भूल राजू पोस्टमैन, रामी बौराणी, जीतू बगडवाल आदि प्रसिद्ध हैं. भारी भूल उनका पहला नाटक था. उनके गीतों के संग्रह की पुस्तकों में गीत गंगा, जौंल मंगरी, छम घुंघरू बाजला शामिल हैं. उनका एक खुदेड़ गीत ” हे दर्जी दिदा मेरा अंगणी बणें द्या ” बहुत ही लोकप्रिय हुआ. जिसे बाद में गढ़वाली गायिका रेखा धस्माना उनियाल ने भी गाया. वह भी बहुत चर्चित हुआ।

उन्होंने बम्बई में मूवी इंडिया की फिल्म ” खलीफा ” में 1949 में और मून आर्ट पिक्चर की फिल्म ” चौदहवीं रात ” में सहायक निर्देशन के तौर पर भी काम कार्य किया. नेशनल ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कम्पनी में भी सहायक संगीत निर्देशक रहे. नेगी जी ने देहरादून के धर्मपुर स्थित अपने आवास पर इंतिम सॉस ली. उस समय उनके पास पत्नी मनोरमा नेगी, बेटा ललित मोहन नेगी और बहू थे. उनकी एक बेटी  मधु नेगी दिल्ली में और दूसरी बेटी मंजू नेगी फरीदाबाद में हैं.  बहुआयामी प्रतिभा वाले गीतकार, गायक, कवि, निर्देशक व रंगमंच के कलाकार जीत सिंह नेगी को उत्तराखण्ड के लोक गीत/संगीत में हमेशा याद रखा जाएगा।

यही कारण है कि  उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली का प्रयास है कि नई पीढ़ी के नौनिहालों को स्वगीय जीत सिंह नेगी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित कराया जा सके।  इसी दिशा में आगामी वर्ष 2027 में जब जीत सिंह नेगी जी की सौवीं जयंती होगी तब मंच द्वारा एक बृहद रूप में इस हिमालय के विराट व्यक्ति को याद किया जा सके कि नई पीढ़ी को लगे की इस महामानव ने अपने सम्पूर्ण जीवन में लोक संस्कृति व नाटकों के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। यह हम सबका दायित्व है कि हम नेगी जी को याद करें।  उनकी बिरासत को सहेजें और आगे सम्प्रेषित करें। 

इस दिशा में उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा वर्ष 14 दिसम्बर, 2024  को उत्तराखण्ड सरकार को स्थानिक आयुक्त दिल्ली के माध्यम से एक पत्र द्वारा मांग की थी की स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की जयंती पर उत्तराखण्ड सरकार को आयोजन करना चाहिए।  लेकिन सरकार ने आयोजन तो दूर पत्र का जवाब भी देना उचित नहीं समझा।  हमारे लोक और भाषा-साहित्य के प्रति हमारी सरकारों का नैराश्यपूर्ण व्यवहार कभी-कभी मायूस करता है।

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