नई दिल्ली : उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल माननीय भगत कोशियारी जी को पद्म भूषण एवं मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमाड़ी गांव के रहने वाले 84 वर्षीय खेमलाल सुंदरियाल को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। ये उत्तराखंड के लिए गौरव की बात है।
कोश्यारी जी को सार्वजनिक जीवन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए देश का उच्च सम्मान पद्मभूषण प्रदान किया गया है। उत्तराखंड की राजनीति में ‘भगत दा’ के नाम से पहचाने जाने वाले कोश्यारी के लिए इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
खेमलाल सुंदरियाल जी को टेक्सटाइल इंडस्ट्री के क्षेत्र में भारत को नई पहचान दिलाने में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया है। सुंदरियाल जी का जन्म उत्तराखंड के छोटे से गांव सुमाड़ी में 2 फरवरी 1943 को हुआ। बचपन से ही उनके मन में कुछ बड़ा करने का सपना था। आर्थिक कठिनाइयों और चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। श्रीनगर से 10वीं तक की पढ़ाई करने के बाद 1964 में उन्होंने श्रीनगर, गढ़वाल से वीविंग का डिप्लोमा हासिल किया और फिर गांव छोड़कर दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्होंने क्लॉथ मिल में नौकरी शुरू की, लेकिन नौकरी में मन न लगने पर वे दिल्ली स्थित बुनकर सेवा केंद्र से जुड़े। यहां उन्होंने ख्याति प्राप्त डिजाइनरों के अधीन अपनी बुनाई में निखार लाकर बाद में कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में बुनकरों को प्रशिक्षण भी दिया।
वर्ष 1975 में खेमराज सुंदरियाल हरियाणा के पानीपत स्थित बुनकर सेवा केंद्र में ट्रांसफर होकर आए। पानीपत को ही उन्होंने अपनी कार्यस्थली बनाया और यहीं के होकर रह गए। यहां उन्होंने टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़कर नए और उम्दा डिजाइन तैयार किए, जो भारत और विदेशों में खूब प्रसिद्ध हुए। उन्होंने बुनकरों को मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देकर उनकी कला को नई ऊंचाई पर पहुंचाया, जिससे न केवल कारीगरों को रोजगार मिला बल्कि पानीपत की पहचान भी वैश्विक स्तर पर मजबूत हुई। खेमराज सुंदरियाल को हैंडलूम और टेपेस्ट्री कला में राष्ट्रीय और हरियाणा राज्य पुरस्कार मिल चुके हैं। सिर्फ यही नहीं जब केंद्रीय सरकार ने कबीर सम्मान की शुरुआत की तो सबसे पहला सम्मान उन्हें ही दिया गया था। अब पद्मश्री मिलने के बाद खेमराज सुंदरियाल देश की महान हस्तियों में शामिल हो गए हैं।
खेमराज सुंदरियाल ने हैंडलूम और बुनाई के क्षेत्र में वर्षों से समाज और कला दोनों में अपनी छाप छोड़ी है। उनका जीवन और संघर्ष यह दिखाता है कि लगन, मेहनत और समर्पण से कोई भी ऊंचाई हासिल की जा सकती है।

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